साइकोलॉजी में कॅरियर के कई विकल्प
कोई भी व्यक्ति कैसे सोचता है? या विभिन्न स्थितियों में किसी व्यक्ति का व्यवहार बदल कैसे जाता है? या किसी अजनबी से बात करते समय एक व्यक्ति असहज क्यों हो जाता है, जबकि कई लोगों को इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि वे किससे बात कर रहे हैं? अगर इन प्रश्नों की तलाश आपको रहती है तो निश्चित ही आपकी रुचि साइकोलॉजी में हैं। ऐसे में इस विषय में कॅरियर की तलाश आपको कामयाबी की ओर ले जा सकती है। जानिए साइकोलॉजी के फील्ड में आपके लिए क्या संभावनाए हैं।
हाई स्कूल में इसे चुनना होगा बेहतर : एक साइकोलॉजिस्ट बनने के लिए बारहवीं में आप किसी भी स्ट्रीम को चुन सकतें हैं। हालांकि आजकल बहुत-से स्कूल्स अपने करिकुलम में साइकोलॉजी को भी ऑप्शनल सब्जेक्ट के रुप में ऑफर करतें हैं। इसके बारे में अपने अंदर बेसिक समझ पैदा करने के लिए आप बारहवीं कक्षा में ही मनोविज्ञान को सब्जेक्ट के रुप में अपनाए।
साइकोलॉजी में बैचलर्स : साइकोलॉजी में बैचलर (बीए या बीएससी) डिग्री कोर्स करना एक साइकोलॉजिस्ट बनने के लिए फांउडेशन का काम करता है। इस डिग्री के दौरान एक स्टूडेंट को इस कोर्स से जुडे़ सभी विषय पढ़ने को मिलते हैं, जो आपको आपकी रुचि के बारें में जानने में हेल्प करता है। इस कोर्स के दौरान स्टूडेंट्स, जनरल साइकोलॉजी, क्लिनिकल साइकोलॉजी, सोशल साइकोलॉजी, डेवलपमेंट साइकोलॉजी, ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर आदि सब्जेक्ट्स का अध्ययन करते हैं। आमतौर पर साइकोलॉजी से जुड़े हुए विषयों में थ्योरिटिकल मैटर अधिक पढ़ना पड़ता है, लेकिन इसके स्टैटिस्टिक्स सब्जेक्ट में न्यूमैरिकल एप्लिकेशंस की स्टडी भी शामिल है।
पोस्ट ग्रेजुएशन : पोस्ट ग्रेजुएशन में एडमिशन लेने के लिए बहुत-से कॉलेज एंट्रेस टेस्ट लेते है। ग्रेजुएशन में अलग सब्जेक्ट या स्ट्रीम वाले स्टूडेंट्स भी साइकॉलाजी में पोस्ट ग्रेजुएशन कर सकते है। इस दौरान आपको अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र चुनना पड़ता है और किसी निर्धारित टॉपिक का गहरा अध्ययन करना होता है। इस कोर्स में आपको किसी विशेषज्ञ के निर्देशन में दो से तीन महीनों का रिसर्च कार्य भी करना पड़ता है।
साइकोलॉजी क्षेत्र में अवसर : पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद बहुत-से अवसर उपलब्ध हैं, जैसे-एनजीओ, ओल्ड एज होम्स, रिहैबिलिटेशन सेंटर आदि। इनमें काउंसलर्स की जरुरत होती है। इन समस्याओं में क्लाएंट्स के जीवन की दर्दनाक घटनाएं या रिलेशनशिप्स की समस्याएं भी शामिल होती हैं। इसी तरह ओल्ड एज होम्स में काउंसलर्स परिवार जैसा माहौल बनाने की कोशिश करते हैं।
कॅरिअर के विकल्प : साइकोलॉजी क्षेत्र में प्रैक्टिस करना चाहने वाले साइकोलॉजिस्ट्स और काउंसलर्स के लिए रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया में रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य है। एक क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट (आरसीआई) के रुप में पै्रक्टिस करने के लिए कैंडिडेट का एमफिल होना जरुरी है।
एजुकेशन क्षेत्र में : साइकोलॉजिस्ट्स के लिए यह अवसरों से भरा क्षेत्र है। स्कूल्स में काउंसलर्स, ट्रेनर्स, कॅरिअर काउंसलर्स आदि विभिन्न जॉब्स उपलब्ध होती हैं। एक साइकोलॉजिस्ट, स्टूडेंट्स को विभिन्न बुरे अनुभवों से उबरने और स्ट्रेस फ्री रहने में मदद करते हैं। इसके अतिरिक्त स्कूल का माहौल सकारात्मक बनाना भी इन्ही का काम होता है। इन क्षेत्रों में इन प्रोफेशनल्स की डिमांड सबसे अधिक होती है।
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट : एमफिल कैंडिडेट्स इंडिपेंडेंट पै्रक्टिस कर सकते हैं। किसी साइकैट्रिस्ट के समान ये भी मरीजों को बहुत-सी थैरेपी देते है। हालांकि साइकैट्रिस्ट बनने के लिए एमबीबीएस करने के बाद पीजी में साइकैट्री सब्जेक्ट चुनना होता है। एक साइकोलॉजिस्ट मरीजों को दवाइयों के बारे में सलाह नही दे सकता।
ऑर्गेनाइजेशनल साइकोलॉजिस्ट : ये साइकोलॉजिस्ट्स, मल्टीनेशनल कंपनियों और ऑर्गेनाइजेशंस के साथ ही विभिन्न कंपनियों व संस्थानों के ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट और एचआर विभाग में काम करते हैं। इन प्रोफेशनल्स का मुख्य काम उस संस्थान के कर्मचारियों की समस्याओं को सुलझाना होता है।
रिसर्च : यदि आप रिसर्च करना चाहतें हैं, तो इस क्षेत्र में क्वालिटेटिव और क्वांटिटेटिव, दोनों तरह की रिसर्च की जा सकती है। आप इस क्षेत्र में पीएचडी भी कर सकते हैं।
यहां से करें पढ़ाई : दिल्ली यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी, अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, टाटा
इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, पंजाब यूनिवर्सिटी, अलिगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी