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Objective Questions

Latest Jharkhand SET Exam Question (Objective Questions), MCQ in Hindi

Subjects : Teaching and Research Aptitude

Question Bank Jharkhand SET Exam Paper 1 - Hindi
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Teaching and Research Aptitude

प्रश्न 1Single Answer
फोटो ब्लीडिंग का अर्थ है :
  1. A
    फोटो क्रोपिंग
  2. B
    फोटो स्थापन
  3. C
    फोटो कटिंग
  4. D
    फोटो रंगों का समायोजन
प्रश्न 2Single Answer
संचार रणनीति बनाते समय पुनर्निवेशन अध्ययन किसके द्वारा किया जाता है ?
  1. A
    श्रोता
  2. B
    संचारक
  3. C
    सैटेलाइट
  4. D
    संचार माध्यम
प्रश्न 3Single Answer
किस भाषाई पत्रों का सबसे अधिक वितरण है ?
  1. A
    अंग्रेजी
  2. B
    हिन्दी
  3. C
    बंगाली
  4. D
    तमिल
प्रश्न 4Single Answer
शिक्षा के माध्यम से कल्याण होता है ?
  1. A
    समाज के सभी वर्गों का
  2. B
    आदर्श परिवार का
  3. C
    मनुष्य के व्यक्तित्व का
  4. D
    छात्र व छात्राओं का
प्रश्न 5Single Answer
आत्म - संप्रेषण की कहते हैं :
  1. A
    संगठनात्मक संप्रेषण
  2. B
    अफवाह संप्रेषण
  3. C
    अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण
  4. D
    अंत:वैयक्तिक संप्रेषण
प्रश्न 6Single Answer
‘SITE’ पद का पूर्ण रूप है :
  1. A
    सैटलाइट इण्डियन टेलीविजन एक्सपेरीमेन्ट
  2. B
    सैटलाइट इन्टरनेशनल टेलीविजन एक्सपेरीमेन्ट
  3. C
    सैटलाइट इन्सट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरीमेन्ट
  4. D
    सैटलाइट इन्सट्रक्शनल टीचर्स एजुकेशन
प्रश्न 7Single Answer
इस श्रृंखला में अगली कौन - सी संख्या आयेगी ?
2 , 5 , 9 , 19 , 37 ,.................. 
  1. A
    76
  2. B
    74
  3. C
    75
  4. D
    50
प्रश्न 8Single Answer
प्रौढ़ शिक्षा किन व्यक्तियों के अधिकार में होनी चाहिए ?
  1. A
    सरकार के हाथ में
  2. B
    शिक्षित व्यक्तियों के हाथ में
  3. C
    गैर-सरकारी समितियों के हाथ में
  4. D
    उपरोक्त सभी के हाथ में
प्रश्न 9Single Answer
एक प्रदत्त कूट में यदि '367' का अर्थ ’मैं प्रसन्न हूं , '748' का अर्थ है 'आप उदास हैं'  और '469' का अर्थ है 'प्रसन्न और उदास' । तो निम्नलिखित में से कूट में और किससे प्रदर्शित होगा ?
  1. A
    3 
  2. B
    6
  3. C
    9
  4. D
    4
प्रश्न 10Single Answer
निम्नलिखित वर्गीकरण का आधार है : 
'पशु' 'आदमी', 'घर', 'किताब' और 'विद्यार्थी' 
  1. A
    निश्चित वर्णन
  2. B
    व्यक्तिवाचक नाम
  3. C
    वर्णनात्मक संक्षिप्त वाक्य
  4. D
    सर्वसामान्य नाम
प्रश्न 11Single Answer
 कथन (A) : अगली बार उछाले जाने पर सिक्का पट्ट (tail)  पड़ेगा । 
कारण   (R) : क्योंकि  एक साथ पांच बार पहले उछाले जाने पर सिक्का प्रत्येक बार  पड़ेगा । 
निम्न में से सही उत्तर चुनिये :
  1. A
    (A)  और (R) दोनों सत्य हैं और (R) , (A) की सही व्याख्या है ।
  2. B
    (A) और (R) दोनों असत्य हैं और (R),  (A) की सही व्याख्या है ।
  3. C
    (A) शंकास्पद है, (R) सत्य हैं और (R), (A)  की सही व्याख्या नहीं है ।
  4. D
    (A) शंकास्पद है (R) असत्य हैं, और (R) (A)  की सही व्याख्या है ।
प्रश्न 12Single Answer
सम्बन्ध 'जो उनकी बहन है' है -
  1. A
    बिन - सममितीय
  2. B
    सममितीय
  3. C
    असममितीय
  4. D
    सकर्मक
प्रश्न 13Single Answer
एक शोधपत्र शोधकार्य की रिपोर्ट होता हैं, जिसका आधार होता है :
  1. A
    केवल प्राथमिक आंकड़ा
  2. B
    केवल द्वितीय आंकड़ा
  3. C
    प्राथमिक और द्वितीय आंकड़ा दोनों
  4. D
    उपर्युक्त में से कोई नहीं
प्रश्न 14Single Answer
न्यूटन ने गति के नियम के तीन मूल सिद्धांत प्रस्तुत किये । उनके इस शोध को वर्गीकृत किया गया है :
  1. A
    वर्णनात्मक शोध के रूप में
  2. B
    प्रतिदर्श (नमूना) सर्वेक्षण के रूप में
  3. C
    मूलभूत शोध के रूप में
  4. D
    व्यावहारिक शोध के रूप में
प्रश्न 15Single Answer
’शाकाहारी मांसाहारी नहीं होते ।’’ यदि यह कथन असत्य है , तो निम्नलिखित अनुमानों में से कौन -से सही हैं ?
निम्न कूट से सही  चुनिये : 
1. ’’कुछ शाकाहारी मांसाहारी होते हैं । ’’ यह सत्य है । 
2. ’’सभी शाकाहारी मांसाहारी होते हैं । ’’ यह शंकास्पद है । 
3.  ’’कुछ शाकाहारी मांसाहारी नहीं होते हैं ।’’ यह सत्य है ।
4. ’’कुछ शाकाहारी मांसाहारी नहीं होते हैं ।’’  यह शंकास्पद  है । 
कूट :  
  1. A
    1 , 2 और 3 
  2. B
    2 , 3 और 4  
  3. C
    1 , 3 और 4
  4. D
    1 , 2 और 4 
प्रश्न 16Single Answer
विशेषज्ञों का ज्ञान के एक विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित वर्ग एक स्थान पर एक नए पाठ्यक्रम के पाठ्य विवरण तैयार करने के लिए एकत्रित हुआ । इस प्रक्रिया को कहा जा सकता है :
  1. A
    संगोष्ठी (सेमिनार)
  2. B
    कार्यशाला
  3. C
    सम्मेलन (कॉन्फरेंस)
  4. D
    गोष्ठी (सिम्पोजियम)
प्रश्न 17Single Answer
शोधकार्य करने की प्रक्रिया में परिकल्पना को सूत्रबद्ध करने के पश्चात् आता  है :
  1. A
    उद्देश्यों का कथन
  2. B
    आंकड़ों की व्याख्या
  3. C
    शोध उपकरण का चयन
  4. D
    आंकड़ों का एकत्रीकरण
प्रश्न 18Single Answer
निम्नलिखित परिभाषा का स्वरूप हैं :
'गरीब’ का अर्थ है वे लोग जिनकी वार्षिक आय रू. 10,000 है ।  
  1. A
    विश्वासोत्पादक
  2. B
    निश्चित
  3. C
    पदसम्बन्धी
  4. D
    स्वनिर्दिष्ट
प्रश्न 19Single Answer
निम्नलिखित युक्तियों में से कौन - सी युक्ति नहीं ?
  1. A
    यदि आज मंगलवार है, तो कल बुधवार होगा ।
  2. B
    चूंकि आज मंगलवार है, कल बुधवार होगा ।
  3. C
    राम ने मुझे अपमानित किया, इसीलिए मैन उसके नाक पर हमला बोला।
  4. D
    राम घर पर नहीं है, इसीलिए वो शहर गया होगा ।
प्रश्न 20Single Answer
वैन डायग्राम इस प्रकार का उायग्राम है, जो :
  1. A
    वर्गों के बुलियन एलजीब्रा की मदद से प्राथमिक अनुमानों की सत्यता का प्रतिनिधित्व और मूल्यांकन करता है ।
  2. B
    वर्गों के बुलियन एलजीब्रा की मदद से प्राथमिक अनुमानों की वैधता का प्रतिनिधित्व और मूल्यांकन करता है ।
  3. C
    वर्गों के बुलियन एलजीब्रा की मदद से प्राथमिक अनुमानों की वैधता का प्रतिनिधित्व करता है, परन्तु मूल्यांकन नहीं करता है ।
  4. D
    वर्गों के बुलियन एलजीब्रा की मदद से प्राथमिक अनुमानों की वैधता, का मूल्यांकन करता है, परन्तु प्रतिनिधित्व नहीं करता है
प्रश्न 21Single Answer
 निम्न सूचित कथनों में से कौन - से कथन सत्य हैं ?निम्न सूचित कूट में से चुनें : 
1. कूछ युक्तियां जो पूर्णतः वैध नहीं हैं , वो अधिकतर वैध हैं । 
2.  ठोस युक्ति अवैध हो सकती है । 
3. निश्चायक युक्ति में सम्भवतः गलत निष्कर्ष हो सकता है ।
4. विधान सत्यात्मक अथवा असत्यात्मक हो सकता है । 
कूट : 
  1. A
    1 और 2
  2. B
    1 , 3 और 4
  3. C
    केवल 4
  4. D
    3 और 4
प्रश्न 22Single Answer
एक हॉल में 10 लैम्प हैं । उनमें से प्रत्येक को अलग से बंद किया जा सकता है । हाल को कितने तरीकों से प्रदीप्त किया जा सकता है ?
  1. A
    102
  2. B
    2023
  3. C
    210
  4. D
    10
प्रश्न 23Single Answer
लोक संचार सहज हो जाता है :
  1. A
    ज्यादा जटिल संरचना के अन्दर
  2. B
    ज्यादा राजनीतिक संरचना के अन्दर
  3. C
    ज्यादा सुविधाजनक संरचना के अन्दर
  4. D
    ज्यादा औपचारिक संरचना के अन्दर
प्रश्न 24Single Answer
सोच, विचारों  तथा संदेशों को वाचिक तथा अवाचिक चिह्मों (प्रतीकों) में रूपान्तरित करना क्या कहलाता है ?
  1. A
    चैनलीकरण (प्रणालकरण)
  2. B
    मध्यस्थता
  3. C
    कूटलेखन
  4. D
    कूटवचन
प्रश्न 25Single Answer
प्रभावपूर्ण संचार को कैसा सहायक वातावरण चाहिये ?
  1. A
    आर्थिक वातावरण
  2. B
    राजनीतिक वातावरण
  3. C
    सामाजिक वातावरण
  4. D
    बहु - सांस्कृतिक वातावरण
प्रश्न 26Single Answer
100 और 300 के बीच कितनी संख्या 2 के साथ प्रारम्भ और समाप्त होती हैं ?
  1. A
    100
  2. B
    110
  3. C
    120
  4. D
    180
प्रश्न 27Single Answer
संचार की प्रक्रिया में संज्ञानात्मक आंकड़े के प्रेषण में मुख्य रुकावट होती है :
  1. A
    व्यक्तित्व
  2. B
    अपेक्षा
  3. C
    सामाजिक दर्जा
  4. D
    कूटबद्ध करने की योग्यता
प्रश्न 28Single Answer
प्रेषित होने पर, सांस्थानिक रूढ़िबद्ध धारणाएं बन जाती है
  1. A
    मिथक
  2. B
    कारण
  3. C
    अनुभव
  4. D
    विश्वास या दृढ़ धारणा
प्रश्न 29Single Answer
एक कालॅेज में 300 छात्र है प्रत्येक छात्र 5 समाचार पत्र पढ़ता है प्रत्येक समाचार पत्र 60 छात्रों द्वारा पढ़ा जाता है समाचार पत्रों की कितनी संख्या आवश्यक है
  1. A
    कम से कम 30
  2. B
    ज्यादा से ज्यादा 20
  3. C
    पूरे 25
  4. D
    पूरे 5
प्रश्न 30Single Answer
जन संचार में, चयनात्मक अवबोधन प्रापक की ........पर निर्भर करता है ।
  1. A
    निपुणता
  2. B
    प्रवणता
  3. C
    ग्रहणशीलता
  4. D
    नृजातीयता
प्रश्न 31Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद ध्यानपूर्वक पढ़िए और परिच्छेद के बारे में अपनी समझ के आधार पर  का उत्तर दीजिये : 
सभी इतिहासकार ग्रन्थ चाहे वो निजी पत्र, सरकारी अभिलेखया पल्ली जन्म सूचियां या कुछ भी हों , के निर्वचक होते हैं । अधिकांश प्रकार के इतिहासकारों के लिये, स्वयं ग्रन्थों को छोड़कर अन्य किसी को समझने का यह सिर्फ आवश्यक माध्यम है, जैसे कि राजनीतिक कार्रवाई  या ऐतिहासिक प्रवृत्ति। जबकि , बौद्धिक इतिहासकार के लिये , उसके चयनित ग्रन्थ को ही पूर्णतया समझना पूछताठ का लक्ष्य होता   है । निस्संदेह , बौद्धिक इतिहास,  अन्य विषयों,  जो अपने ही उद्देश्यों के लिये ग्रन्थों का आदतन निर्वचन कर रहे हैं और तर्कणा जो निष्कर्ष को दिखावटी रूप से क्षेत्र के साथ जोड़ती है , पर फोकस करके निष्कर्ष निकालने को विशेषतः प्रवृत होता है । इसके अतिरिक्त , सम्बन्धित उप -विषय क्षेत्रों के साथ सीमाएं बदल या खिसक रही हैं और अस्पष्ट हैं कला का इतिहास और विज्ञान का इतिहास दोनों कुछ स्वायत्तता कादावा करते हैं , आंशिक रूप से इसलिये क्योंकि उन्हें विशेषित तकनीकि कौशलों की जरूरत हैं , परन्तु दोनों को व्यापक बौद्धिक इतिहास के भाग के रूप में भी देखाजा सकता है , जैसा कि स्पष्ट होता है जब हम ब्रह्माण्डकीय धारणाओं अथवा  कालिक नैतिक आदर्शों के बारे में ज्ञान के सर्व सामान्य स्टॉक के बारे में विचार करते हैं ।  सभी इतिहासकारों की तरह से ,  बौद्धिक इतिहासकार ’’विधियों’’ का उत्पादक होने के बजाय उनका उपभोक्ता होता है । उसकी विशिष्टता विगतकाल के उस पहलू जिस पर वह प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या तकनीकों के समूह पर एकमात्र स्वामित्व होने में स्थित नहीं है । यह कह लेने के बाद, यह जश्र प्रतीत होता है कि ’’बौद्धिक इतिहास’’ का नाम गलतफहमी के अनानुपातिक भाग को आकर्षित करता है । यह कहा जाता है कि बौद्धिक इतिहास किसी ऐसी चीज का इतिहास है जिसे कभी महत्व नहीं दिया जाता था। राजनीतिक इतिहासकारों के ऐतिहासिक स्वामित्व पर दीर्घकालीन प्रभुत्व एक प्रकार की विषयासक्ति (फिलिस्तिनिज्म) , अनकही घारणा की सत्ता और उसके प्रयोग  का ही वास्तव में महत्व था, को जन्म देता है। इस दावे से पूर्वाग्रह संबलित हुआ कि राजनीतिक कार्रवाई वास्तव में कभी भी उन सिद्धान्तों या विचारों जो  ’’ज्यादा फ्लैपडुडल’’ भे का परिणाम नहीं िी । इस धारणा की बपौती अभी भी इन अपेक्षित विचारों की प्रवृति में दृष्टिगोचर होती है , कि इससे पहले कि राजनीतिक वर्ग को बौद्धिक सत्कार के योग्य समझा जा सके अनुज्ञापत्र प्राप्त हो , मानो इसके कुछ कारण हैं कि क्यों कला या विज्ञान , दर्शनशास्त्र या साहित्य का इतिहास दलों या संसदों के इतिहास की तुलना में दिलचस्पी और महत्व का हैं । शायद हाल ही के वर्षों  में इस फिलीस्तिनिज्म (विषयासक्ति) की दर्पण - प्रतिच्छाया इस दावे में ज्यादा सर्वसामान्य रही है कि किसी के विचार विधिवत अभिव्यक्ति के अथवा दुनियादारी के हैं का कोई महत्व नहीं है ,मानो वह सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के विचार हैं ।   
बौद्धिक इतिहासकार का लक्ष्य निम्नलिखित में से किसे समझने का होता है ?
  1. A
    उसके अपने विशेष ग्रन्थ 
  2. B
    राजनीतिक कार्रवाइयां 
  3. C
    ऐतिहासिक प्रवृतियां 
  4. D
    उसकी पूछताछ  
प्रश्न 32Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद ध्यानपूर्वक पढ़िए और परिच्छेद के बारे में अपनी समझ के आधार पर  का उत्तर दीजिये : 
सभी इतिहासकार ग्रन्थ चाहे वो निजी पत्र, सरकारी अभिलेखया पल्ली जन्म सूचियां या कुछ भी हों , के निर्वचक होते हैं । अधिकांश प्रकार के इतिहासकारों के लिये, स्वयं ग्रन्थों को छोड़कर अन्य किसी को समझने का यह सिर्फ आवश्यक माध्यम है, जैसे कि राजनीतिक कार्रवाई  या ऐतिहासिक प्रवृत्ति। जबकि , बौद्धिक इतिहासकार के लिये , उसके चयनित ग्रन्थ को ही पूर्णतया समझना पूछताठ का लक्ष्य होता   है । निस्संदेह , बौद्धिक इतिहास,  अन्य विषयों,  जो अपने ही उद्देश्यों के लिये ग्रन्थों का आदतन निर्वचन कर रहे हैं और तर्कणा जो निष्कर्ष को दिखावटी रूप से क्षेत्र के साथ जोड़ती है , पर फोकस करके निष्कर्ष निकालने को विशेषतः प्रवृत होता है । इसके अतिरिक्त , सम्बन्धित उप -विषय क्षेत्रों के साथ सीमाएं बदल या खिसक रही हैं और अस्पष्ट हैं कला का इतिहास और विज्ञान का इतिहास दोनों कुछ स्वायत्तता कादावा करते हैं , आंशिक रूप से इसलिये क्योंकि उन्हें विशेषित तकनीकि कौशलों की जरूरत हैं , परन्तु दोनों को व्यापक बौद्धिक इतिहास के भाग के रूप में भी देखाजा सकता है , जैसा कि स्पष्ट होता है जब हम ब्रह्माण्डकीय धारणाओं अथवा  कालिक नैतिक आदर्शों के बारे में ज्ञान के सर्व सामान्य स्टॉक के बारे में विचार करते हैं ।  सभी इतिहासकारों की तरह से ,  बौद्धिक इतिहासकार ’’विधियों’’ का उत्पादक होने के बजाय उनका उपभोक्ता होता है । उसकी विशिष्टता विगतकाल के उस पहलू जिस पर वह प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या तकनीकों के समूह पर एकमात्र स्वामित्व होने में स्थित नहीं है । यह कह लेने के बाद, यह जश्र प्रतीत होता है कि ’’बौद्धिक इतिहास’’ का नाम गलतफहमी के अनानुपातिक भाग को आकर्षित करता है । यह कहा जाता है कि बौद्धिक इतिहास किसी ऐसी चीज का इतिहास है जिसे कभी महत्व नहीं दिया जाता था। राजनीतिक इतिहासकारों के ऐतिहासिक स्वामित्व पर दीर्घकालीन प्रभुत्व एक प्रकार की विषयासक्ति (फिलिस्तिनिज्म) , अनकही घारणा की सत्ता और उसके प्रयोग  का ही वास्तव में महत्व था, को जन्म देता है। इस दावे से पूर्वाग्रह संबलित हुआ कि राजनीतिक कार्रवाई वास्तव में कभी भी उन सिद्धान्तों या विचारों जो  ’’ज्यादा फ्लैपडुडल’’ भे का परिणाम नहीं  । इस धारणा की बपौती अभी भी इन अपेक्षित विचारों की प्रवृति में दृष्टिगोचर होती है , कि इससे पहले कि राजनीतिक वर्ग को बौद्धिक सत्कार के योग्य समझा जा सके अनुज्ञापत्र प्राप्त हो , मानो इसके कुछ कारण हैं कि क्यों कला या विज्ञान , दर्शनशास्त्र या साहित्य का इतिहास दलों या संसदों के इतिहास की तुलना में दिलचस्पी और महत्व का हैं । शायद हाल ही के वर्षों  में इस फिलीस्तिनिज्म (विषयासक्ति) की दर्पण - प्रतिच्छाया इस दावे में ज्यादा सर्वसामान्य रही है कि किसी के विचार विधिवत अभिव्यक्ति के अथवा दुनियादारी के हैं का कोई महत्व नहीं है ,मानो वह सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के विचार हैं ।   
बौद्धिक इतिहासकार किसके एकमात्र स्वामित्व का दवा नहीं है ?
  1. A
    निष्कर्ष 
  2. B
    प्रमाण का कोई भी संग्रह  
  3. C
    विशिष्टता  
  4. D
    आदतन निर्वचन   
प्रश्न 33Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद ध्यानपूर्वक पढ़िए और परिच्छेद के बारे में अपनी समझ के आधार पर  का उत्तर दीजिये : 
सभी इतिहासकार ग्रन्थ चाहे वो निजी पत्र, सरकारी अभिलेखया पल्ली जन्म सूचियां या कुछ भी हों , के निर्वचक होते हैं । अधिकांश प्रकार के इतिहासकारों के लिये, स्वयं ग्रन्थों को छोड़कर अन्य किसी को समझने का यह सिर्फ आवश्यक माध्यम है, जैसे कि राजनीतिक कार्रवाई  या ऐतिहासिक प्रवृत्ति। जबकि , बौद्धिक इतिहासकार के लिये , उसके चयनित ग्रन्थ को ही पूर्णतया समझना पूछताठ का लक्ष्य होता   है । निस्संदेह , बौद्धिक इतिहास,  अन्य विषयों,  जो अपने ही उद्देश्यों के लिये ग्रन्थों का आदतन निर्वचन कर रहे हैं और तर्कणा जो निष्कर्ष को दिखावटी रूप से क्षेत्र के साथ जोड़ती है , पर फोकस करके निष्कर्ष निकालने को विशेषतः प्रवृत होता है । इसके अतिरिक्त , सम्बन्धित उप -विषय क्षेत्रों के साथ सीमाएं बदल या खिसक रही हैं और अस्पष्ट हैं कला का इतिहास और विज्ञान का इतिहास दोनों कुछ स्वायत्तता कादावा करते हैं , आंशिक रूप से इसलिये क्योंकि उन्हें विशेषित तकनीकि कौशलों की जरूरत हैं , परन्तु दोनों को व्यापक बौद्धिक इतिहास के भाग के रूप में भी देखाजा सकता है , जैसा कि स्पष्ट होता है जब हम ब्रह्माण्डकीय धारणाओं अथवा  कालिक नैतिक आदर्शों के बारे में ज्ञान के सर्व सामान्य स्टॉक के बारे में विचार करते हैं ।  सभी इतिहासकारों की तरह से ,  बौद्धिक इतिहासकार ’’विधियों’’ का उत्पादक होने के बजाय उनका उपभोक्ता होता है । उसकी विशिष्टता विगतकाल के उस पहलू जिस पर वह प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या तकनीकों के समूह पर एकमात्र स्वामित्व होने में स्थित नहीं है । यह कह लेने के बाद, यह जश्र प्रतीत होता है कि ’’बौद्धिक इतिहास’’ का नाम गलतफहमी के अनानुपातिक भाग को आकर्षित करता है । यह कहा जाता है कि बौद्धिक इतिहास किसी ऐसी चीज का इतिहास है जिसे कभी महत्व नहीं दिया जाता था। राजनीतिक इतिहासकारों के ऐतिहासिक स्वामित्व पर दीर्घकालीन प्रभुत्व एक प्रकार की विषयासक्ति (फिलिस्तिनिज्म) , अनकही घारणा की सत्ता और उसके प्रयोग  का ही वास्तव में महत्व था, को जन्म देता है। इस दावे से पूर्वाग्रह संबलित हुआ कि राजनीतिक कार्रवाई वास्तव में कभी भी उन सिद्धान्तों या विचारों जो  ’’ज्यादा फ्लैपडुडल’’ भे का परिणाम नहीं  । इस धारणा की बपौती अभी भी इन अपेक्षित विचारों की प्रवृति में दृष्टिगोचर होती है , कि इससे पहले कि राजनीतिक वर्ग को बौद्धिक सत्कार के योग्य समझा जा सके अनुज्ञापत्र प्राप्त हो , मानो इसके कुछ कारण हैं कि क्यों कला या विज्ञान , दर्शनशास्त्र या साहित्य का इतिहास दलों या संसदों के इतिहास की तुलना में दिलचस्पी और महत्व का हैं । शायद हाल ही के वर्षों  में इस फिलीस्तिनिज्म (विषयासक्ति) की दर्पण - प्रतिच्छाया इस दावे में ज्यादा सर्वसामान्य रही है कि किसी के विचार विधिवत अभिव्यक्ति के अथवा दुनियादारी के हैं का कोई महत्व नहीं है ,मानो वह सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के विचार हैं ।   
बौद्धिक इतिहासकार के बारे में गलतमियां किससे उत्पन्न होती हैं ?
  1. A
    तकनीकों का समूह 
  2. B
    ज्ञान का सामान्य स्टॉक  
  3. C
    राजनीतिक इतिहासकारों का प्रभुत्व 
  4. D
    ब्रह्माण्डकीय धारणाएं 
प्रश्न 34Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद ध्यानपूर्वक पढ़िए और परिच्छेद के बारे में अपनी समझ के आधार पर  का उत्तर दीजिये : 
सभी इतिहासकार ग्रन्थ चाहे वो निजी पत्र, सरकारी अभिलेखया पल्ली जन्म सूचियां या कुछ भी हों , के निर्वचक होते हैं । अधिकांश प्रकार के इतिहासकारों के लिये, स्वयं ग्रन्थों को छोड़कर अन्य किसी को समझने का यह सिर्फ आवश्यक माध्यम है, जैसे कि राजनीतिक कार्रवाई  या ऐतिहासिक प्रवृत्ति। जबकि , बौद्धिक इतिहासकार के लिये , उसके चयनित ग्रन्थ को ही पूर्णतया समझना पूछताठ का लक्ष्य होता   है । निस्संदेह , बौद्धिक इतिहास,  अन्य विषयों,  जो अपने ही उद्देश्यों के लिये ग्रन्थों का आदतन निर्वचन कर रहे हैं और तर्कणा जो निष्कर्ष को दिखावटी रूप से क्षेत्र के साथ जोड़ती है , पर फोकस करके निष्कर्ष निकालने को विशेषतः प्रवृत होता है । इसके अतिरिक्त , सम्बन्धित उप -विषय क्षेत्रों के साथ सीमाएं बदल या खिसक रही हैं और अस्पष्ट हैं कला का इतिहास और विज्ञान का इतिहास दोनों कुछ स्वायत्तता कादावा करते हैं , आंशिक रूप से इसलिये क्योंकि उन्हें विशेषित तकनीकि कौशलों की जरूरत हैं , परन्तु दोनों को व्यापक बौद्धिक इतिहास के भाग के रूप में भी देखाजा सकता है , जैसा कि स्पष्ट होता है जब हम ब्रह्माण्डकीय धारणाओं अथवा  कालिक नैतिक आदर्शों के बारे में ज्ञान के सर्व सामान्य स्टॉक के बारे में विचार करते हैं ।  सभी इतिहासकारों की तरह से ,  बौद्धिक इतिहासकार ’’विधियों’’ का उत्पादक होने के बजाय उनका उपभोक्ता होता है । उसकी विशिष्टता विगतकाल के उस पहलू जिस पर वह प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या तकनीकों के समूह पर एकमात्र स्वामित्व होने में स्थित नहीं है । यह कह लेने के बाद, यह जश्र प्रतीत होता है कि ’’बौद्धिक इतिहास’’ का नाम गलतफहमी के अनानुपातिक भाग को आकर्षित करता है । यह कहा जाता है कि बौद्धिक इतिहास किसी ऐसी चीज का इतिहास है जिसे कभी महत्व नहीं दिया जाता था। राजनीतिक इतिहासकारों के ऐतिहासिक स्वामित्व पर दीर्घकालीन प्रभुत्व एक प्रकार की विषयासक्ति (फिलिस्तिनिज्म) , अनकही घारणा की सत्ता और उसके प्रयोग  का ही वास्तव में महत्व था, को जन्म देता है। इस दावे से पूर्वाग्रह संबलित हुआ कि राजनीतिक कार्रवाई वास्तव में कभी भी उन सिद्धान्तों या विचारों जो  ’’ज्यादा फ्लैपडुडल’’ भे का परिणाम नहीं  । इस धारणा की बपौती अभी भी इन अपेक्षित विचारों की प्रवृति में दृष्टिगोचर होती है , कि इससे पहले कि राजनीतिक वर्ग को बौद्धिक सत्कार के योग्य समझा जा सके अनुज्ञापत्र प्राप्त हो , मानो इसके कुछ कारण हैं कि क्यों कला या विज्ञान , दर्शनशास्त्र या साहित्य का इतिहास दलों या संसदों के इतिहास की तुलना में दिलचस्पी और महत्व का हैं । शायद हाल ही के वर्षों  में इस फिलीस्तिनिज्म (विषयासक्ति) की दर्पण - प्रतिच्छाया इस दावे में ज्यादा सर्वसामान्य रही है कि किसी के विचार विधिवत अभिव्यक्ति के अथवा दुनियादारी के हैं का कोई महत्व नहीं है ,मानो वह सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के विचार हैं ।   
विषयासक्तिवाद (फिलिस्तिनिज्म) क्या है ?
  1. A
    पूर्वाग्रह का पुनर्बलित होना 
  2. B
    कारणों को गढ़ना 
  3. C
    भूस्वामियों का प्रभाव 
  4. D
    यह धारणा कि सत्ता और उसके प्रयोग का महत्व होता है   
प्रश्न 35Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद ध्यानपूर्वक पढ़िए और परिच्छेद के बारे में अपनी समझ के आधार पर  का उत्तर दीजिये : 
सभी इतिहासकार ग्रन्थ चाहे वो निजी पत्र, सरकारी अभिलेखया पल्ली जन्म सूचियां या कुछ भी हों , के निर्वचक होते हैं । अधिकांश प्रकार के इतिहासकारों के लिये, स्वयं ग्रन्थों को छोड़कर अन्य किसी को समझने का यह सिर्फ आवश्यक माध्यम है, जैसे कि राजनीतिक कार्रवाई  या ऐतिहासिक प्रवृत्ति। जबकि , बौद्धिक इतिहासकार के लिये , उसके चयनित ग्रन्थ को ही पूर्णतया समझना पूछताठ का लक्ष्य होता   है । निस्संदेह , बौद्धिक इतिहास,  अन्य विषयों,  जो अपने ही उद्देश्यों के लिये ग्रन्थों का आदतन निर्वचन कर रहे हैं और तर्कणा जो निष्कर्ष को दिखावटी रूप से क्षेत्र के साथ जोड़ती है , पर फोकस करके निष्कर्ष निकालने को विशेषतः प्रवृत होता है । इसके अतिरिक्त , सम्बन्धित उप -विषय क्षेत्रों के साथ सीमाएं बदल या खिसक रही हैं और अस्पष्ट हैं कला का इतिहास और विज्ञान का इतिहास दोनों कुछ स्वायत्तता कादावा करते हैं , आंशिक रूप से इसलिये क्योंकि उन्हें विशेषित तकनीकि कौशलों की जरूरत हैं , परन्तु दोनों को व्यापक बौद्धिक इतिहास के भाग के रूप में भी देखाजा सकता है , जैसा कि स्पष्ट होता है जब हम ब्रह्माण्डकीय धारणाओं अथवा  कालिक नैतिक आदर्शों के बारे में ज्ञान के सर्व सामान्य स्टॉक के बारे में विचार करते हैं ।  सभी इतिहासकारों की तरह से ,  बौद्धिक इतिहासकार ’’विधियों’’ का उत्पादक होने के बजाय उनका उपभोक्ता होता है । उसकी विशिष्टता विगतकाल के उस पहलू जिस पर वह प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या तकनीकों के समूह पर एकमात्र स्वामित्व होने में स्थित नहीं है । यह कह लेने के बाद, यह जश्र प्रतीत होता है कि ’’बौद्धिक इतिहास’’ का नाम गलतफहमी के अनानुपातिक भाग को आकर्षित करता है । यह कहा जाता है कि बौद्धिक इतिहास किसी ऐसी चीज का इतिहास है जिसे कभी महत्व नहीं दिया जाता था। राजनीतिक इतिहासकारों के ऐतिहासिक स्वामित्व पर दीर्घकालीन प्रभुत्व एक प्रकार की विषयासक्ति (फिलिस्तिनिज्म) , अनकही घारणा की सत्ता और उसके प्रयोग  का ही वास्तव में महत्व था, को जन्म देता है। इस दावे से पूर्वाग्रह संबलित हुआ कि राजनीतिक कार्रवाई वास्तव में कभी भी उन सिद्धान्तों या विचारों जो  ’’ज्यादा फ्लैपडुडल’’ भे का परिणाम नहीं  । इस धारणा की बपौती अभी भी इन अपेक्षित विचारों की प्रवृति में दृष्टिगोचर होती है , कि इससे पहले कि राजनीतिक वर्ग को बौद्धिक सत्कार के योग्य समझा जा सके अनुज्ञापत्र प्राप्त हो , मानो इसके कुछ कारण हैं कि क्यों कला या विज्ञान , दर्शनशास्त्र या साहित्य का इतिहास दलों या संसदों के इतिहास की तुलना में दिलचस्पी और महत्व का हैं । शायद हाल ही के वर्षों  में इस फिलीस्तिनिज्म (विषयासक्ति) की दर्पण - प्रतिच्छाया इस दावे में ज्यादा सर्वसामान्य रही है कि किसी के विचार विधिवत अभिव्यक्ति के अथवा दुनियादारी के हैं का कोई महत्व नहीं है ,मानो वह सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के विचार हैं ।   
ब्रह्माण्डकीय धारणाओं या कालिक नैतिक विचारों का ज्ञान किसके अंश के रूप में निकाला जा सकता है ?
  1. A
    साहित्यिक आलोचना 
  2. B
    विज्ञान का इतिहास 
  3. C
    दर्शनशास्त्र का इतिहास 
  4. D
    बौद्धिक इतिहास   
प्रश्न 36Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद ध्यानपूर्वक पढ़िए और परिच्छेद के बारे में अपनी समझ के आधार पर  का उत्तर दीजिये : 
सभी इतिहासकार ग्रन्थ चाहे वो निजी पत्र, सरकारी अभिलेखया पल्ली जन्म सूचियां या कुछ भी हों , के निर्वचक होते हैं । अधिकांश प्रकार के इतिहासकारों के लिये, स्वयं ग्रन्थों को छोड़कर अन्य किसी को समझने का यह सिर्फ आवश्यक माध्यम है, जैसे कि राजनीतिक कार्रवाई  या ऐतिहासिक प्रवृत्ति। जबकि , बौद्धिक इतिहासकार के लिये , उसके चयनित ग्रन्थ को ही पूर्णतया समझना पूछताठ का लक्ष्य होता   है । निस्संदेह , बौद्धिक इतिहास,  अन्य विषयों,  जो अपने ही उद्देश्यों के लिये ग्रन्थों का आदतन निर्वचन कर रहे हैं और तर्कणा जो निष्कर्ष को दिखावटी रूप से क्षेत्र के साथ जोड़ती है , पर फोकस करके निष्कर्ष निकालने को विशेषतः प्रवृत होता है । इसके अतिरिक्त , सम्बन्धित उप -विषय क्षेत्रों के साथ सीमाएं बदल या खिसक रही हैं और अस्पष्ट हैं कला का इतिहास और विज्ञान का इतिहास दोनों कुछ स्वायत्तता कादावा करते हैं , आंशिक रूप से इसलिये क्योंकि उन्हें विशेषित तकनीकि कौशलों की जरूरत हैं , परन्तु दोनों को व्यापक बौद्धिक इतिहास के भाग के रूप में भी देखाजा सकता है , जैसा कि स्पष्ट होता है जब हम ब्रह्माण्डकीय धारणाओं अथवा  कालिक नैतिक आदर्शों के बारे में ज्ञान के सर्व सामान्य स्टॉक के बारे में विचार करते हैं ।  सभी इतिहासकारों की तरह से ,  बौद्धिक इतिहासकार ’’विधियों’’ का उत्पादक होने के बजाय उनका उपभोक्ता होता है । उसकी विशिष्टता विगतकाल के उस पहलू जिस पर वह प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या कोशिश कर रहा है , में स्थित है और प्रमाण के समूह या तकनीकों के समूह पर एकमात्र स्वामित्व होने में स्थित नहीं है । यह कह लेने के बाद, यह जश्र प्रतीत होता है कि ’’बौद्धिक इतिहास’’ का नाम गलतफहमी के अनानुपातिक भाग को आकर्षित करता है । यह कहा जाता है कि बौद्धिक इतिहास किसी ऐसी चीज का इतिहास है जिसे कभी महत्व नहीं दिया जाता था। राजनीतिक इतिहासकारों के ऐतिहासिक स्वामित्व पर दीर्घकालीन प्रभुत्व एक प्रकार की विषयासक्ति (फिलिस्तिनिज्म) , अनकही घारणा की सत्ता और उसके प्रयोग  का ही वास्तव में महत्व था, को जन्म देता है। इस दावे से पूर्वाग्रह संबलित हुआ कि राजनीतिक कार्रवाई वास्तव में कभी भी उन सिद्धान्तों या विचारों जो  ’’ज्यादा फ्लैपडुडल’’ भे का परिणाम नहीं  । इस धारणा की बपौती अभी भी इन अपेक्षित विचारों की प्रवृति में दृष्टिगोचर होती है , कि इससे पहले कि राजनीतिक वर्ग को बौद्धिक सत्कार के योग्य समझा जा सके अनुज्ञापत्र प्राप्त हो , मानो इसके कुछ कारण हैं कि क्यों कला या विज्ञान , दर्शनशास्त्र या साहित्य का इतिहास दलों या संसदों के इतिहास की तुलना में दिलचस्पी और महत्व का हैं । शायद हाल ही के वर्षों  में इस फिलीस्तिनिज्म (विषयासक्ति) की दर्पण - प्रतिच्छाया इस दावे में ज्यादा सर्वसामान्य रही है कि किसी के विचार विधिवत अभिव्यक्ति के अथवा दुनियादारी के हैं का कोई महत्व नहीं है ,मानो वह सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग के विचार हैं ।   
विधिवत अभिव्यक्ति के बारे में किसी के विचारों का कोई महत्व नहीं है, मानो वो विचार अल्पसंख्यक वर्ग के हैं, यह किसके लिये है ?
  1. A
    अनुज्ञापत्र प्राप्त राजनीतिक वर्ग 
  2. B
    राजनीतिक कार्रवाई
  3. C
    साहित्य का दर्शन 
  4. D
    फिलिस्तिनिज्म की दर्पण - प्रतिच्छाया
प्रश्न 37Single Answer
गद्यांश :
विभिन्न क्षेत्रों से कुलCo2 उत्सर्जन 5 mmtहै । नीचे दिये पाई चार्ट में , विभिन्न क्षेत्रों से बव2 उत्सर्जन के प्रति प्रतिशत योगदान इंगित किया गया है । 
  बताइये घरेलू क्षेत्र से कूल Co2 उत्सर्जन कितना है ? 
  1. A
    1- 5 mmt 
  2. B
    2- 5 mmt
  3. C
    1- 75 mmt
  4. D
    0- 75 mmt 
प्रश्न 38Single Answer
गद्यांश :
विभिन्न क्षेत्रों से कुलCo2 उत्सर्जन 5 mmtहै । नीचे दिये पाई चार्ट में , विभिन्न क्षेत्रों से बव2 उत्सर्जन के प्रति प्रतिशत योगदान इंगित किया गया है । 
तापीय ऊर्जा तथा परिवहन क्षेत्र दोनों से इकट्ठा कुल Co2 उत्सर्जन कितना है ?
  1. A
    3- 25 mmt 
  2. B
    1- 5 mmt
  3. C
    2- 5 mmt  
  4. D
    4 mmt 
प्रश्न 39Single Answer
गद्यांश :
निम्न चित्र पर आधारित हैं , जिसमें जीन वृत्त A, P तथा S एक - दूसरे को काटते हैं । ये वृत्त A कलाकारों , वृत P प्राध्यपकों तथा वृत S खिलाड़ियों को प्रदर्शित करते है । चित्र में सभी क्षेत्रों को a से f तक चिह्नित किया गया है ।   
कौन - सा क्षेत्र उन कलाकारों को प्रदर्शिता करता है जो न तो खिलाड़ी हैं और न ही प्राध्यापक ?
  1. A
    d 
  2. B
    e 
  3. C
    b 
  4. D
    g
प्रश्न 40Single Answer
गद्यांश :
निम्न चित्र पर आधारित हैं , जिसमें जीन वृत्त A, P तथा S एक - दूसरे को काटते हैं । ये वृत्त A कलाकारों , वृत P प्राध्यपकों तथा वृत S खिलाड़ियों को प्रदर्शित करते है । चित्र में सभी क्षेत्रों को a से f तक चिह्नित किया गया है ।   
कौन - सा क्षेत्र उन प्राध्यापकों को प्रदर्शिता करता है जो कलाकार तथा खिलाड़ी भी हैं ?
  1. A
    a 
  2. B
    c 
  3. C
    d 
  4. D
    g
प्रश्न 41Single Answer
गद्यांश :
निम्न चित्र पर आधारित हैं , जिसमें जीन वृत्त A, P तथा S एक - दूसरे को काटते हैं । ये वृत्त A कलाकारों , वृत P प्राध्यपकों तथा वृत S खिलाड़ियों को प्रदर्शित करते है । चित्र में सभी क्षेत्रों को a से f तक चिह्नित किया गया है ।   
कौन -सा क्षेत्र उन प्राध्यापकों को प्रदर्शित करता है जो खिलाड़ी तो हैं किन्तु कलाकार नहीं ? 
  1. A
    e 
  2. B
    f 
  3. C
    c
  4. D
    g 
प्रश्न 42Single Answer
गद्यांश :
निम्न आंकड़ों पर आधारित है । किसी चर X का मापन 10  बजे से 10ः12 बजे तक प्रत्येक मिनट के अन्तराल के बाद किया गया तथा ये आंकड़े प्राप्त हुये : 
X : 60, 62, 65, 64, 63, 61, 66, 65, 70, 68
63, 62, 64, 69, 65, 64, 66, 67, 66, 64
X का वह मान ज्ञात करिये जिसके ऊपर मापन की अवधि में 10%  समय के लिये X के मान हैं :   
  1. A
    69 
  2. B
    68 
  3. C
    67 
  4. D
    66   
प्रश्न 43Single Answer
गद्यांश :
निम्न आंकड़ों पर आधारित है । किसी चर X का मापन 10  बजे से 10ः12 बजे तक प्रत्येक मिनट के अन्तराल के बाद किया गया तथा ये आंकड़े प्राप्त हुये : 
X : 60, 62, 65, 64, 63, 61, 66, 65, 70, 68
63, 62, 64, 69, 65, 64, 66, 67, 66, 64
X का वह मान ज्ञात करिये जिसके ऊपर मापन की अवधि में 90% समय के लिये X के मान हैं :   
  1. A
    63 
  2. B
    62 
  3. C
    61 
  4. D
    60  
प्रश्न 44Single Answer
गद्यांश :
निम्न आंकड़ों पर आधारित है । किसी चर X का मापन 10  बजे से 10ः12 बजे तक प्रत्येक मिनट के अन्तराल के बाद किया गया तथा ये आंकड़े प्राप्त हुये : 
X : 60, 62, 65, 64, 63, 61, 66, 65, 70, 68
63, 62, 64, 69, 65, 64, 66, 67, 66, 64
X का वह मान ज्ञात करिये जिसके ऊपर मापन की अवधि में 50% समय के लिये X के मान हैं :   
  1. A
    66 
  2. B
    65  
  3. C
    64 
  4. D
    63   
प्रश्न 45Single Answer
गद्यांश :
निम्नलिखित परिच्छेद को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न क्दजिए :
बीसवीं शताब्दी का उत्प्रेरक तथ्य अनियन्त्रित विकास , उपभेगवादी समाज, राजनीतिक भौतिकवाद तथा आध्यात्मिक अवमूल्यन है । इस अस्वाभाविक विकास ने पवित्र बोध की ’द्वितीय वास्तविकता’ की ओर प्रवृत किया है कि जैविक रूप से , लोकोतत्रता मानवीय जीवन का ही हिस्सा है । शताब्दी के अंत में , यह अत्यावश्यक बल के साथ स्पष्ट हुआ कि प्रबुद्ध बुद्धिवाद की ’प्रथम वास्तविकता’ तथा लोकोतर की ’द्वितीय वास्तविकता’ का मनुष्य की श्रेष्ठ स्थिति में संश्लेषण किया जाना चाहिये । यथातथ्य मूल्य हमारा विवरण देते हैं , वे हमारी नैतिकता के है का चित्रण करते हैं , वे एस्ट मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्ट का अर्थ ’है’ होता है।) । आदर्श  मूल्य हमें यह बताते हैं कि हमें क्या होना चाहिये , वे एस्टो मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्टो का अर्थ है जो होना चाहिये)। दोनों को हमारी चेतना के उतार - चढ़ाव का भाग हेना चाहिये । नित्य नया विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी और शाश्वत विश्वास एक ही निश्चयात्मकता के दो रूप हैं, यानि , वे मानव की सम्पूर्णता, उसकी जीवटता का साहस और पारमार्थिक में उसकी भागीदारी  है। विज्ञान के भौतिक आधार धराशायी हो गये हैं। विज्ञान ने स्वयं सिद्ध कर दिया है कि द्रव्य ही ऊर्जा है ,  तयिं के समान ही प्रक्रियाएं वैध हैं , और उसके यह भी सिद्ध कर दिया है कि ब्रह्माण्ड अ - भौतिक है । नई शताब्दी में वैज्ञानिक और मानपीय ’दोनों संस्कृतियां’ साधारण दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करेंगी और वैज्ञानिक समझ की आधारशिला बनेंगी । उससे इस पौराणिक मत को एक नया अर्थ मिलेगा कि प्रकृति का आधार गुणत्मक और मात्रात्मक है । मानवीय उद्यम मानवीय सरोकारों के प्रति गैर जिम्मेदार नहीं हो सकते हैं । 
परिच्छेद में चर्चित समस्या समग्र रूप से किस पर विचार करती है ? 
  1. A
    उपभोक्तावाद 
  2. B
    भौतिकवाद
  3. C
    आध्यात्मिक अवमूल्यन 
  4. D
    असाधारण विकास   
प्रश्न 46Single Answer
गद्यांश :
निम्नलिखित परिच्छेद को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न क्दजिए :
बीसवीं शताब्दी का उत्प्रेरक तथ्य अनियन्त्रित विकास , उपभेगवादी समाज, राजनीतिक भौतिकवाद तथा आध्यात्मिक अवमूल्यन है । इस अस्वाभाविक विकास ने पवित्र बोध की ’द्वितीय वास्तविकता’ की ओर प्रवृत किया है कि जैविक रूप से , लोकोतत्रता मानवीय जीवन का ही हिस्सा है । शताब्दी के अंत में , यह अत्यावश्यक बल के साथ स्पष्ट हुआ कि प्रबुद्ध बुद्धिवाद की ’प्रथम वास्तविकता’ तथा लोकोतर की ’द्वितीय वास्तविकता’ का मनुष्य की श्रेष्ठ स्थिति में संश्लेषण किया जाना चाहिये । यथातथ्य मूल्य हमारा विवरण देते हैं , वे हमारी नैतिकता के है का चित्रण करते हैं , वे एस्ट मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्ट का अर्थ ’है’ होता है।) । आदर्श  मूल्य हमें यह बताते हैं कि हमें क्या होना चाहिये , वे एस्टो मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्टो का अर्थ है जो होना चाहिये)। दोनों को हमारी चेतना के उतार - चढ़ाव का भाग हेना चाहिये । नित्य नया विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी और शाश्वत विश्वास एक ही निश्चयात्मकता के दो रूप हैं, यानि , वे मानव की सम्पूर्णता, उसकी जीवटता का साहस और पारमार्थिक में उसकी भागीदारी  है। विज्ञान के भौतिक आधार धराशायी हो गये हैं। विज्ञान ने स्वयं सिद्ध कर दिया है कि द्रव्य ही ऊर्जा है ,  तयिं के समान ही प्रक्रियाएं वैध हैं , और उसके यह भी सिद्ध कर दिया है कि ब्रह्माण्ड अ - भौतिक है । नई शताब्दी में वैज्ञानिक और मानपीय ’दोनों संस्कृतियां’ साधारण दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करेंगी और वैज्ञानिक समझ की आधारशिला बनेंगी । उससे इस पौराणिक मत को एक नया अर्थ मिलेगा कि प्रकृति का आधार गुणत्मक और मात्रात्मक है । मानवीय उद्यम मानवीय सरोकारों के प्रति गैर जिम्मेदार नहीं हो सकते हैं ।
परिच्छेद में ’यथातथ्य’ मूल्यों का अभिप्राय है : 
  1. A
    क्या है 
  2. B
    क्या होना चाहिये
  3. C
    क्या हो सकता है 
  4. D
    कहां है  
प्रश्न 47Single Answer
गद्यांश :
निम्नलिखित परिच्छेद को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न क्दजिए :
बीसवीं शताब्दी का उत्प्रेरक तथ्य अनियन्त्रित विकास , उपभेगवादी समाज, राजनीतिक भौतिकवाद तथा आध्यात्मिक अवमूल्यन है । इस अस्वाभाविक विकास ने पवित्र बोध की ’द्वितीय वास्तविकता’ की ओर प्रवृत किया है कि जैविक रूप से , लोकोतत्रता मानवीय जीवन का ही हिस्सा है । शताब्दी के अंत में , यह अत्यावश्यक बल के साथ स्पष्ट हुआ कि प्रबुद्ध बुद्धिवाद की ’प्रथम वास्तविकता’ तथा लोकोतर की ’द्वितीय वास्तविकता’ का मनुष्य की श्रेष्ठ स्थिति में संश्लेषण किया जाना चाहिये । यथातथ्य मूल्य हमारा विवरण देते हैं , वे हमारी नैतिकता के है का चित्रण करते हैं , वे एस्ट मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्ट का अर्थ ’है’ होता है।) । आदर्श  मूल्य हमें यह बताते हैं कि हमें क्या होना चाहिये , वे एस्टो मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्टो का अर्थ है जो होना चाहिये)। दोनों को हमारी चेतना के उतार - चढ़ाव का भाग हेना चाहिये । नित्य नया विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी और शाश्वत विश्वास एक ही निश्चयात्मकता के दो रूप हैं, यानि , वे मानव की सम्पूर्णता, उसकी जीवटता का साहस और पारमार्थिक में उसकी भागीदारी  है। विज्ञान के भौतिक आधार धराशायी हो गये हैं। विज्ञान ने स्वयं सिद्ध कर दिया है कि द्रव्य ही ऊर्जा है ,  तयिं के समान ही प्रक्रियाएं वैध हैं , और उसके यह भी सिद्ध कर दिया है कि ब्रह्माण्ड अ - भौतिक है । नई शताब्दी में वैज्ञानिक और मानपीय ’दोनों संस्कृतियां’ साधारण दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करेंगी और वैज्ञानिक समझ की आधारशिला बनेंगी । उससे इस पौराणिक मत को एक नया अर्थ मिलेगा कि प्रकृति का आधार गुणत्मक और मात्रात्मक है । मानवीय उद्यम मानवीय सरोकारों के प्रति गैर जिम्मेदार नहीं हो सकते हैं ।
परिचछेद के अनुसार , ’प्रथम वास्तविकता’ में क्या सम्मिलित होता है ? 
  1. A
    आर्थिक समृद्धता
  2. B
    राजनीतिक विकास   
  3. C
     पावन बोध  
  4. D
    प्रबुद्ध बुद्धिवाद   
प्रश्न 48Single Answer
गद्यांश :
निम्नलिखित परिच्छेद को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न क्दजिए :
बीसवीं शताब्दी का उत्प्रेरक तथ्य अनियन्त्रित विकास , उपभेगवादी समाज, राजनीतिक भौतिकवाद तथा आध्यात्मिक अवमूल्यन है । इस अस्वाभाविक विकास ने पवित्र बोध की ’द्वितीय वास्तविकता’ की ओर प्रवृत किया है कि जैविक रूप से , लोकोतत्रता मानवीय जीवन का ही हिस्सा है । शताब्दी के अंत में , यह अत्यावश्यक बल के साथ स्पष्ट हुआ कि प्रबुद्ध बुद्धिवाद की ’प्रथम वास्तविकता’ तथा लोकोतर की ’द्वितीय वास्तविकता’ का मनुष्य की श्रेष्ठ स्थिति में संश्लेषण किया जाना चाहिये । यथातथ्य मूल्य हमारा विवरण देते हैं , वे हमारी नैतिकता के है का चित्रण करते हैं , वे एस्ट मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्ट का अर्थ ’है’ होता है।) । आदर्श  मूल्य हमें यह बताते हैं कि हमें क्या होना चाहिये , वे एस्टो मूल्य हैं (लेटिन भाषा में एस्टो का अर्थ है जो होना चाहिये)। दोनों को हमारी चेतना के उतार - चढ़ाव का भाग हेना चाहिये । नित्य नया विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी और शाश्वत विश्वास एक ही निश्चयात्मकता के दो रूप हैं, यानि , वे मानव की सम्पूर्णता, उसकी जीवटता का साहस और पारमार्थिक में उसकी भागीदारी  है। विज्ञान के भौतिक आधार धराशायी हो गये हैं। विज्ञान ने स्वयं सिद्ध कर दिया है कि द्रव्य ही ऊर्जा है ,  तयिं के समान ही प्रक्रियाएं वैध हैं , और उसके यह भी सिद्ध कर दिया है कि ब्रह्माण्ड अ - भौतिक है । नई शताब्दी में वैज्ञानिक और मानपीय ’दोनों संस्कृतियां’ साधारण दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करेंगी और वैज्ञानिक समझ की आधारशिला बनेंगी । उससे इस पौराणिक मत को एक नया अर्थ मिलेगा कि प्रकृति का आधार गुणत्मक और मात्रात्मक है । मानवीय उद्यम मानवीय सरोकारों के प्रति गैर जिम्मेदार नहीं हो सकते हैं ।
वैज्ञानिक तथा मानवीय दो संस्कृतियों के मेल का तात्पर्य है : 
  1. A
    सामान्य दृष्टिकोण की पुनर्स्थापना । 
  2. B
    ब्रह्माण्ड भौतिक तथा अ - भौतिक दोनों है।
  3. C
    मानव, प्रकृति की तुलना में उतकृष्ट है 
  4. D
    प्रकृति में मात्रा तथा गुण की सह - विद्यमानता
प्रश्न 49Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद पढ़िये और परिच्छेद की अपनी समझ के आधार पर आगे का उत्तर दीजिये :
यह स्मरण रखना चाहिये कि सभी राष्ट्रवादी आन्दोलनों की ताह से भारत में राष्ट्रवादी आन्दोलन अनिवार्य तौर पर मध्यवर्गीय (बूर्जुआ) आन्दोलन था । यह विकास की स्वाभाविक ऐतिहासिक अवस्था को निरूपित करता है , और इसे श्रमजीवी वर्ग आन्दोलन समझना अथवा ऐसा सोच कर उसकी अलोचना करना गलत है । गांधीजी इस आनदोलन का , और इस आन्दोलन के सम्बन्ध में भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व सर्वोच्च श्रेणी तक करते है , और वे उस सीमा तक भारतीय लागों की आवाज बन गए । भारत और भारतीय जनता के प्रति गांधीजी का मुख्य योदान उन शक्तिशाली  आन्दोलनों ,  जो कि उन्होंने राष्ट्रीय कांग्रेस के जरिये चलाये , के माध्यम से था । गांधीजी ने राष्ट्रव्यापी कार्रवाई के जरिये करोड़ों लागों को गढ़ने (अथवा बदल डालने) की चेष्टा की , और उन्हें बदलने में सामान्य तौर पर सफल हुए । वे हतोत्साहित , भीरू और निराश लागों , भयाभिभूत और प्रत्येक प्रबल हित द्वारा परास्त और विरोध करने में अक्षम लोगों को आत्म - सम्मान युक्त , आत्म - निर्भर , तानाशाही के विरोधी , और संयुक्त कार्रवाई तथा ज्यादा बड़े लक्ष्य के लिये बलिदान करने वाले लोगों में बदलने में काफी हद तक सफल हुए ।  गांधाजी ने लोगों को राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर सोचने के लिये प्रेरित किया ओर प्रत्येक गांव और प्रत्येक बाजार नये विचारों तथा नई आशाओं , जो लोगों में मर गई थीं पर तर्क एवं बहस के साथ गूंजने लगा । यह सब अद्भुत मनोवैज्ञाहनिक परिवर्तन था । निस्संदेह , इसके लिये समय आ चुका था और परिस्थियों तथा विश्व की स्थितियों ने इस परिवर्तन के लिये कार्य किया । परन्तु परिस्थितियों तथा स्थितियों का लाभ उठाने के लिये महान नेता आवश्यक है । गांधीजी वो नेता  थे , और उन्होंने बहुत से वो बन्धन खोल दिये जिने हमारे दिमाग को कैद और विकलांग किया हुआ था । हम भारतीय लोगों में जिस किसी ने इसका अनुभव किया है वह मुक्ति और उल्लास की उस महान अनुभूति  को कभी भी नहीं भुला सकता है । गंधीजी ने भारत में अत्यधिक महत्वपूर्ण क्रान्तिकारी भूमिका  अदा की है , क्योंकि वे जानते थे कि किस प्रकार वस्तुनिष्ठ स्थियों का सर्वाधिक लाभ उठाया जाए तथा किस प्रकार जनता के दिलों तक पहुंचा जाये । जबकि ज्यादा उन्नत विचारधारा के समूहों ने सामान्यतया हवा में ही कार्य किया , क्यों कि वह उन स्थितियों के साथ ठीक - ठीक तरह से जम नहीं सके और इसलिये जन साधारण में यथेष्ठ प्रतिक्रिया नहीं जागृत कर सके । यह पूर्णतया सत्य है कि गांधीजी राष्ट्रवादी स्तर पर कार्य करते रहे और उन्होंने वर्गो के संघर्ष के बारे में नहीं सोचा और उनके आपसी भेदों को शांत करने की कोशिश की । परन्तु उन्होंने लोगों को जिस कार्य में लगाया और जो शिक्षा दी उसने जनचेतना को अनिवार्यतः आश्चर्यजनक रूप में जगा दिया , और सामाजिक मुद्दों को सजीव बना दिया । गांधीजी और कागें्रस को उनके द्वारा अपनाई  गई नीतियों एवं  उनकी कार्यवाही के आधार पर समझना चाहिये । परन्तु इसके पीछे , व्यक्तित्व मायने रखता है और उन नीतियों और गतिविधियों को रंजित  करता है । गांधीजी जैसे प्रत्येक असाधारण व्यक्ति के मामले में उन्हें समझने और उसका  मूल्यांकन करने के लिये व्यक्तित्व का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है । हमारे लिये वे भारत की आत्मा और प्रमिष्ठा तथा उसके विषदग्रस्त करोड़ों लागों की अपने अनन्त कष्टों से मुक्त  होने की उत्कण्ठा का प्रतिनिधित्व करते है , और ब्रिटिश सरकार अथ्वा अन्य द्वारा उनका अपमान भारत और उसके लोगों का अपमान है ।  
प्रदत्त परिच्छेद के बारे में निम्नलिखित में कौन - सा कथन सत्य है ?
  1. A
    परिच्छेद स्वतन्त्रता के लिये भरतीय आन्दोलन में गांधीजी की भूमिका की समीक्षा है । 
  2. B
    परिच्छेद भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में गांधीजी की भूमिका का अभिवादन करता है ।
  3. C
    लेखक भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में गांधीजी की भूमिका पर तटस्थ है ।        
  4. D
    यह श्रमजीवी वर्ग आन्दोलन के प्रति इण्डियन नेशनल कांग्रेस के  समर्थन का विवरण हैं ।
प्रश्न 50Single Answer
गद्यांश :
नीचे दिया गया परिच्छेद पढ़िये और परिच्छेद की अपनी समझ के आधार पर आगे का उत्तर दीजिये :
यह स्मरण रखना चाहिये कि सभी राष्ट्रवादी आन्दोलनों की ताह से भारत में राष्ट्रवादी आन्दोलन अनिवार्य तौर पर मध्यवर्गीय (बूर्जुआ) आन्दोलन था । यह विकास की स्वाभाविक ऐतिहासिक अवस्था को निरूपित करता है , और इसे श्रमजीवी वर्ग आन्दोलन समझना अथवा ऐसा सोच कर उसकी अलोचना करना गलत है । गांधीजी इस आनदोलन का , और इस आन्दोलन के सम्बन्ध में भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व सर्वोच्च श्रेणी तक करते है , और वे उस सीमा तक भारतीय लागों की आवाज बन गए । भारत और भारतीय जनता के प्रति गांधीजी का मुख्य योदान उन शक्तिशाली  आन्दोलनों ,  जो कि उन्होंने राष्ट्रीय कांग्रेस के जरिये चलाये , के माध्यम से था । गांधीजी ने राष्ट्रव्यापी कार्रवाई के जरिये करोड़ों लागों को गढ़ने (अथवा बदल डालने) की चेष्टा की , और उन्हें बदलने में सामान्य तौर पर सफल हुए । वे हतोत्साहित , भीरू और निराश लागों , भयाभिभूत और प्रत्येक प्रबल हित द्वारा परास्त और विरोध करने में अक्षम लोगों को आत्म - सम्मान युक्त , आत्म - निर्भर , तानाशाही के विरोधी , और संयुक्त कार्रवाई तथा ज्यादा बड़े लक्ष्य के लिये बलिदान करने वाले लोगों में बदलने में काफी हद तक सफल हुए ।  गांधाजी ने लोगों को राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर सोचने के लिये प्रेरित किया ओर प्रत्येक गांव और प्रत्येक बाजार नये विचारों तथा नई आशाओं , जो लोगों में मर गई थीं पर तर्क एवं बहस के साथ गूंजने लगा । यह सब अद्भुत मनोवैज्ञाहनिक परिवर्तन था । निस्संदेह , इसके लिये समय आ चुका था और परिस्थियों तथा विश्व की स्थितियों ने इस परिवर्तन के लिये कार्य किया । परन्तु परिस्थितियों तथा स्थितियों का लाभ उठाने के लिये महान नेता आवश्यक है । गांधीजी वो नेता  थे , और उन्होंने बहुत से वो बन्धन खोल दिये जिने हमारे दिमाग को कैद और विकलांग किया हुआ था । हम भारतीय लोगों में जिस किसी ने इसका अनुभव किया है वह मुक्ति और उल्लास की उस महान अनुभूति  को कभी भी नहीं भुला सकता है । गंधीजी ने भारत में अत्यधिक महत्वपूर्ण क्रान्तिकारी भूमिका  अदा की है , क्योंकि वे जानते थे कि किस प्रकार वस्तुनिष्ठ स्थियों का सर्वाधिक लाभ उठाया जाए तथा किस प्रकार जनता के दिलों तक पहुंचा जाये । जबकि ज्यादा उन्नत विचारधारा के समूहों ने सामान्यतया हवा में ही कार्य किया , क्यों कि वह उन स्थितियों के साथ ठीक - ठीक तरह से जम नहीं सके और इसलिये जन साधारण में यथेष्ठ प्रतिक्रिया नहीं जागृत कर सके । यह पूर्णतया सत्य है कि गांधीजी राष्ट्रवादी स्तर पर कार्य करते रहे और उन्होंने वर्गो के संघर्ष के बारे में नहीं सोचा और उनके आपसी भेदों को शांत करने की कोशिश की । परन्तु उन्होंने लोगों को जिस कार्य में लगाया और जो शिक्षा दी उसने जनचेतना को अनिवार्यतः आश्चर्यजनक रूप में जगा दिया , और सामाजिक मुद्दों को सजीव बना दिया । गांधीजी और कागें्रस को उनके द्वारा अपनाई  गई नीतियों एवं  उनकी कार्यवाही के आधार पर समझना चाहिये । परन्तु इसके पीछे , व्यक्तित्व मायने रखता है और उन नीतियों और गतिविधियों को रंजित  करता है । गांधीजी जैसे प्रत्येक असाधारण व्यक्ति के मामले में उन्हें समझने और उसका  मूल्यांकन करने के लिये व्यक्तित्व का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है । हमारे लिये वे भारत की आत्मा और प्रमिष्ठा तथा उसके विषदग्रस्त करोड़ों लागों की अपने अनन्त कष्टों से मुक्त  होने की उत्कण्ठा का प्रतिनिधित्व करते है , और ब्रिटिश सरकार अथ्वा अन्य द्वारा उनका अपमान भारत और उसके लोगों का अपमान है ।  
गांधीवादी आन्दोलन द्वारा भरतीयजनता में लाए जाने वाले परिवर्तन थे : 
  1. A
    भौतिक  
  2. B
    सांस्कृतिक
  3. C
    प्रौद्योगिकीय
  4. D
    मनोवैज्ञानिक  
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