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Objective Questions

Latest JSSC Lab Assistant Paper 1 Exam Question (Objective Questions), MCQ in English

Subjects : General Hindi Comprehension, Hindi Grammar, General Knowledge

Question Bank JSSC Lab Assistant Exam Paper I - English
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General Hindi Comprehension

Question 1Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
लेखक को कदम्ब का अभाव क्यों खटकता है ?
  1. A
    क्योंकि वह कदम्ब के बिना कृष्ण की कल्पना नहीं कर सकता
  2. B
    क्योंकि वह यह मानता है कि कदम्ब के वृक्ष के बिना कृष्ण पूरे नहीं हैं
  3. C
    लेखक के लिए कृष्ण कृतित्व का आधार कदम्ब है
  4. D
    लेखक प्रकृति प्रेमी है
Question 2Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
निम्नलिखित में से गोपियों के प्रेमभाव विह्नल होने के पीछे कौन उत्प्रेरक का कार्य करता है ?
  1. A
    कदम्ब का वृक्ष
  2. B
    गोपियों का कृष्ण प्रेम
  3. C
    बाँसुरी की धुन
  4. D
    अपने प्रिय से मिलने की तीव्र इच्छा
Question 3Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
निम्नलिखित में से यमुना नदी के किस पर्यायवाची शब्द का गद्यांश में प्रयोग हुआ है ?
  1. A
    रागिनी
  2. B
    कालिन्दी
  3. C
    मनभावनी
  4. D
    लता
Question 4Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
प्रस्तुत गद्यांश की केन्द्रीय विषय - वस्तु के रूप में कौन उपस्थित है ?
  1. A
    गोपियों एवं कृष्ण का प्रेम
  2. B
    कदम्ब का वृक्ष
  3. C
    कृष्ण व कालिन्दी
  4. D
    लौकिकता में अन्तर्निहित अलौकिकता
Question 5Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
निम्नलिखित शब्दों में से कौन - सा शब्द तद्भव शब्द है ?
  1. A
    अन्तर्निहित
  2. B
    माखन
  3. C
    सान्निध्य
  4. D
    कृतित्व
Question 6Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
निम्नलिखित में से किस शब्द में दो प्रत्ययों का प्रयोग हुआ है ?
  1. A
    भाव विह्नल
  2. B
    अलौकिकता
  3. C
    बिसात
  4. D
    मुरलीधर
Question 7Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
‘‘............. पर इस अलौकिकता को पहुँचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों का क्या बिसात ?‘‘ रेखांकित शब्द को निम्नलिखित में से कौन - सा शब्द प्रतिस्थापित कर सकता है ?
  1. A
    लक्ष्य प्राप्त
  2. B
    लब्धप्रतिष्ठित
  3. C
    सिद्ध पुरुष
  4. D
    तत्त्वज्ञानी
Question 8Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
प्रस्तुत गद्यांश में छटपटाहट शब्द का क्या अर्थ है ?
  1. A
    व्याकुलता
  2. B
    व्यग्रता
  3. C
    तीव्र इच्छा
  4. D
    अभिलाषा
Question 9Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
कृष्ण और कालिन्दी दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं। यह तो नहीं कहा सकता कि कदम्ब के बिना कृष्ण अधूरे थे, किन्तु उसका अभाव अवश्य खटकता है। प्रसिद्ध है कृष्ण की बंसी की मधुर आवाज और गोपियों की कृष्णोत्सर्ग प्रेम - कथाएँ। भोर का फूटता प्रभात हो या रात्रि की छिड़ती रागिनी हो।
जब कभी कृष्ण की मुरली पेड़ - पौधों, कुंज लताओं को चीरती, गूँजती हुई गोप - बालाओं के कानों में पहुँचती थी, वे प्रेम में भावविह्नल हो, मदहोश बनी अपने प्रिय के पास चल पड़ती थीं। कहते हैं मुरलीधर का सान्निध्य पाने की गोपियों की अकुलाहट परमात्म - तत्त्व में मिलने की आत्मा की छटपटाहट का संकेत है। इस लौकिकता में भी अलौकिकता अन्तर्निहित है, पर इस अलौकिकता को पहुचे हुए लोग ही समझ पाते हैं। मुझ जैसों की क्या बिसात ? मेरे लिए तो आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी भी प्रकार की क्लिष्टता से बढ़कर है।
मुझे, अगर कुछ सूझता है, तो बस कदम्ब, जिसकी पूर्ण आकृति से लेकर फूल, फल, पत्तियों, मकरन्द, यहाँ तक कि उन सूक्ष्म कोशिकाओं के स्वरूप भी अपनी व्याख्या चाहते हैं मुझसे। कृष्ण का ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन की झुरमुटों और वनों में गायों का चराना, उनकी मनभावनी बंसी की मधुर आवाज सुन गायों का सम्भाना या फिर कृष्ण की माखन चोरी, गोपियों का उलाहना, यशोदा माता की डाँट - फटकार सारे - के - सारे कृष्ण कृतित्व कदम्ब के इर्द - गिर्द चक्कर लगाते प्रतीत होते हैं।
गद्यांश में किस - किस पर कृष्ण की मनभावनी बाँसुरी का प्रभाव दर्शाया गया है ?
  1. A
    केवल जड़ जीवों पर
  2. B
    केवल चेतन जीवों पर
  3. C
    1 और 2 दोनों पर
  4. D
    इनमें से किसी पर नहीं
Question 10Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
गद्यांश के अनुसार पहले के समाज के उपभोक्ता पर कौन हावी दृष्टिगोचर होता है ?
  1. A
    स्वार्थ
  2. B
    नैतिकता
  3. C
    मानवता
  4. D
    यथार्थवादी सोच
Question 11Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
निम्नलिखित में से कौन - सा भाव मनुष्य को सांसारिक संयासी बनाता है ?
  1. A
    उपभोक्तावाद व मानववाद का हावी होना
  2. B
    नैतिक होना
  3. C
    पर हित का भाव रखना
  4. D
    आवश्यकताओं एवं उनकी पूर्ति में स्वयं व अन्य में भेद न करना
Question 12Single Answer
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निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
गद्यांश के अनुसार जो मानवीय गुणों का ह्नास एवं आदर्शों की असुरक्षा उत्पन्न हुई हैं ? उसकी जड़ में कौन - से कारक निहित हैं ?
  1. A
    नव उपभोक्ता संस्कृति
  2. B
    सांस्कृतिक उपनिवेशवाद
  3. C
    1 और 2 दोनों
  4. D
    स्वार्थ की वृद्धि
Question 13Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
गद्यांश के अनुसार किन नैसर्गिक मानवीय गुणों को व्यापकता प्रदान करने तथा उनके और अधिक शुद्ध रूप ग्रहण करने की बात कही गई है ?
  1. A
    नैतिकता
  2. B
    स्वार्थ
  3. C
    सौन्दर्य - बोध तथा संवेदना
  4. D
    सांसारिक संयासी के गुण
Question 14Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
निम्नलिखित में से स्वकेन्द्रित का विलोम शब्द है ?
  1. A
    अन्यकेन्द्रित
  2. B
    आत्मकेन्द्रित
  3. C
    परकेन्द्रित
  4. D
    विकेन्द्रित
Question 15Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
निम्नलिखित में से किस शब्द में दो प्रत्ययों का प्रयोग हुआ है ?
  1. A
    नैतिकता
  2. B
    मनुष्यता
  3. C
    सांसारिक
  4. D
    संवेदना
Question 16Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
निम्नलिखित में से किस शब्द में ‘अ‘ उपसर्ग का प्रयोग नहीं किया जा सकता ?
  1. A
    विकसित
  2. B
    नैतिकता
  3. C
    सुरक्षित
  4. D
    आदर्श
Question 17Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
संकीर्णता शब्द का विलोम शब्द है ?
  1. A
    असंकीर्णता
  2. B
    विशालता
  3. C
    व्यापकता
  4. D
    विस्तार
Question 18Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
नव उपभोक्ता संस्कृति ने पूरे विश्व को खोखली यथार्थवादी सोच दी है। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने तो हद ही कर दी। यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद बड़े राष्ट्रों और छोटे राष्ट्रों, धनी राष्ट्रों और गरीब राष्ट्रों एवं विकसित राष्ट्रों और विकासशील राष्ट्रों के बीच में ही रखा तरबूज नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र और समाज के भीतर पनपता नया स्वकेन्द्रित यथार्थ भी है। मनुष्य की अँजुरी में सहेजे भाव, मुट्ठी भर राख हो गए। कोई आदर्श सुरक्षित नहीं बचा। स्वार्थ के बेखौफ बौखलायेपन ने सम्बन्धों, मूल्यों और संवेदनाओं की जड़ों में अँगारे दाब दिए। पहले के समाज में स्वार्थ न रहा हो, उपभोक्ता न रहा हो, ऐसी बात नहीं है, पर वे लोग मनुष्य पहले थे, उपभोक्ता बाद में। खाते समय कोई आ जाए और घर में यदि और भोजन न हो, तो अपनी थाली में से ही थोड़ा - सा उस भूखे को देने की बात कही गई है। पुराने समय में लोग ऐसा करते भी रहे हैं। इसे नैतिकता भले ही कहे, पहले तो यह मनुष्यता रही है। मनुष्य के सौन्दर्य - बोध और संवेदना का परिष्कार और विस्तार तो होना ही चाहिए। अपनी जरूरतों के साथ दूसरों की जरूरतों का ध्यान और उनकी पूर्ति में समान और समभाव भी व्यक्ति को एक तरह से सांसारिक संयासी ही बनाता है। संकीर्णता, तुच्छता, ढोग और डायनपने से बाहर निकलकर मानवता की उच्चतर जमीन पाना, मुक्ति की रातरानी के देश में पहुँच जाना है। जहाँ बुद्ध, कबीर और गाँधी पहूच सके थे।
निम्नलिखित में से कौन-सा एक तद्भव शब्द है ?
  1. A
    यथार्थ
  2. B
    मनुष्य
  3. C
    मुट्ठी
  4. D
    राष्ट्र
Question 19Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
भारतेन्दु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतन्त्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युग बोध कराने वाला युगदृष्ट्रा का युग था। महात्मा गाँधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों और पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवियों, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर हैं, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर आहूति करने वालों को श्रृंखलाबद्ध समूह के रूप मे भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारम्भिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिण्टर, सम्पादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्ति के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खण्डन उनका उद्देश्य था।
प्रारम्भिक पत्रकारों ने अपने कार्य को सम्पन्न करने के लिए स्वयं बहुआयामी भूमिकाएँ निर्वाह कीं। यह प्रेरणा उन्हें कहाँ से मिली ?
  1. A
    राष्ट्रवादी विचारधारा से
  2. B
    राजनेताओं के संघर्ष से
  3. C
    देशभक्ति से
  4. D
    संसाधनों की कमी से
Question 20Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
भारतेन्दु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतन्त्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युग बोध कराने वाला युगदृष्ट्रा का युग था। महात्मा गाँधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों और पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवियों, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर हैं, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर आहूति करने वालों को श्रृंखलाबद्ध समूह के रूप मे भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारम्भिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिण्टर, सम्पादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्ति के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खण्डन उनका उद्देश्य था।
‘विरोध‘ का विलोम शब्द है ?
  1. A
    प्रतिरोध
  2. B
    गतिरोध
  3. C
    अवरोध
  4. D
    समर्थन
Question 21Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
भारतेन्दु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतन्त्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युग बोध कराने वाला युगदृष्ट्रा का युग था। महात्मा गाँधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों और पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवियों, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर हैं, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर आहूति करने वालों को श्रृंखलाबद्ध समूह के रूप मे भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारम्भिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिण्टर, सम्पादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्ति के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खण्डन उनका उद्देश्य था।
‘देशभक्त‘ का विलोम शब्द है
  1. A
    देशद्रोही
  2. B
    राष्ट्रद्रोही
  3. C
    अदेशभक्त
  4. D
    प्रतिदेशभक्त
Question 22Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
भारतेन्दु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतन्त्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युग बोध कराने वाला युगदृष्ट्रा का युग था। महात्मा गाँधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों और पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवियों, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर हैं, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर आहूति करने वालों को श्रृंखलाबद्ध समूह के रूप मे भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारम्भिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिण्टर, सम्पादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्ति के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खण्डन उनका उद्देश्य था।
किसकी भूमिका को मात्र एक आयाम तक ही सीमित न रखे जाने की आवश्यकता व्यक्त की गई है ?
  1. A
    राजनेताओं की
  2. B
    महात्मा गाँधी की
  3. C
    युगबोध कराने वाले युगदृष्टा की
  4. D
    बुद्धिजीवियों द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन के समय किए गए लेखन कर्म को
Question 23Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
भारतेन्दु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतन्त्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युग बोध कराने वाला युगदृष्ट्रा का युग था। महात्मा गाँधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों और पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवियों, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर हैं, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर आहूति करने वालों को श्रृंखलाबद्ध समूह के रूप मे भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारम्भिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिण्टर, सम्पादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्ति के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खण्डन उनका उद्देश्य था।
‘‘.......... ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर है।‘‘ रेखांकित शब्द के स्थान पर किस और शब्द का प्रयोग किया जा सकता है ?
  1. A
    उपलब्धि
  2. B
    कोस
  3. C
    विरासत
  4. D
    खोज
Question 24Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
भारतेन्दु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतन्त्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युग बोध कराने वाला युगदृष्ट्रा का युग था। महात्मा गाँधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों और पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवियों, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर हैं, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर आहूति करने वालों को श्रृंखलाबद्ध समूह के रूप मे भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारम्भिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिण्टर, सम्पादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्ति के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खण्डन उनका उद्देश्य था।
भारतेन्दु युग को स्वतन्त्रता का युगबोध कराने वाले युगदृष्टा का युग कहा गया है। निम्न में से कौन-सा कथन इस सन्दर्भ में सही नहीं है ?
  1. A
    गाँधीजी ने प्रेरणा इसी युग से प्राप्त की थी
  2. B
    राजनेताओं के साथ - साथ साहित्यकारों, पत्रकारों ने भी अपना योगदान स्वतन्त्रता संघर्ष में दिया
  3. C
    यह युग केवल साहित्य सृजन तक सीमित न था
  4. D
    भारतीय पत्रकारिता का प्रादुर्भाव हुआ
Question 25Single Answer
Passage :
निर्देश :  दिए गए गद्यांश को ध्यान से पढिए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्नो के यथोचित उत्तर दीजिए ?
भारतेन्दु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतन्त्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युग बोध कराने वाला युगदृष्ट्रा का युग था। महात्मा गाँधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों और पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवियों, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर हैं, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर आहूति करने वालों को श्रृंखलाबद्ध समूह के रूप मे भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारम्भिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिण्टर, सम्पादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्ति के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खण्डन उनका उद्देश्य था।
गद्यांश में पत्रकारिता के किस आयाम को प्रकाशित करने का प्रयास किया गया है ?
  1. A
    साहित्यकार
  2. B
    स्वतन्त्रता संघर्ष में भूमिका
  3. C
    राजनेता की भूमिका
  4. D
    गाँधीजी का प्रेरणा स्त्रोत

Hindi Grammar

Question 26Single Answer
शुद्ध वर्तनी का चयन कीजिए
  1. A
    अधम्र
  2. B
    अध्रम
  3. C
    अधर्म
  4. D
    अध्रिम
Question 27Single Answer
शुद्ध वर्तनी का चयन कीजिए
  1. A
    स्थायि
  2. B
    स्थायी
  3. C
    स्थाई
  4. D
    स्थाइ
Question 28Single Answer
वर्तनी की दृष्टि से सही शब्द है?
  1. A
    महत्व
  2. B
    महतव
  3. C
    महत्तव
  4. D
    महतत्व
Question 29Single Answer
निम्नलिखित में से शुद्ध छांटिए?
  1. A
    आयुष्मान
  2. B
    आयुश्मान
  3. C
    आयुशमान
  4. D
     आयुश्यमान
Question 30Single Answer
शुद्ध शब्द नहीं हैं?
  1. A
    कवियत्री 
  2. B
    कौसल्या
  3. C
    एश्वर्य
  4. D
    श्रृंगार
Question 31Single Answer
शुद्ध वर्तनी है -
  1. A
    पूज
  2. B
    पुजय 
  3. C
    पूज्य 
  4. D
    पुज्य 
Question 32Single Answer
शुद्ध वर्तनी है - 
  1. A
    अनुसरण
  2. B
    अनूशरणन
  3. C
    अनुशरण
  4. D
    अणुशर
Question 33Single Answer
किस क्रमांक में सभी शुद्ध हैं?
  1. A
    एक्य,साप्ताहिक
  2. B
    आजीविका,आशीर्वाद
  3. C
    आर्शिवाद ,अनूकूल
  4. D
    निरिक्षण ,कृपालु
Question 34Single Answer
'उज्वल' शब्द का शुद्ध रूप है ?
  1. A
    उज्जव
  2. B
    उज्ज्ल
  3. C
    उज्ज्वल
  4. D
    उजवल
Question 35Single Answer
निम्नलिखित प्रश्न  में चार वैकल्पिक वर्तनियाॅ दी गई है?
  1. A
     जागृत
  2. B
    जाग्रति
  3. C
    जाग्रित
  4. D
    जाग्रत
Question 36Single Answer
निम्नलिखित प्रश्न में चार वैकल्पिक वर्तनियाॅ दी गई है?
  1. A
    उन्नति
  2. B
    उनति
  3. C
    उन्ती
  4. D
    उनती
Question 37Single Answer
निम्नलिखित प्रश्न मे चार वैकल्पिक वर्तनियाॅ दी गई है?
  1. A
    अनुशहरण
  2. B
    अनोसरण
  3. C
    अनुसरन
  4. D
    अनुसरण
Question 38Single Answer
'पृथ्वीराज रासो' किस काल की रचना है ?
  1. A
    आदिकाल
  2. B
    रीतिकाल
  3. C
    भक्तिकाल
  4. D
    आधुनिक काल
Question 39Single Answer
हिन्दी की उत्पत्ति किस भाषा से हुई है?
  1. A
    प्राकृत 
  2. B
    संस्कृत 
  3. C
    शौरसैनी अपभ्रंश
  4. D
    मागधी
Question 40Single Answer
राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष थे ?
  1. A
    बी. जी. खरे 
  2. B
    राजा लक्ष्मण सिंह
  3. C
    प्रताप नारायण मिश्र
  4. D
    इंशाअल्ला खा
Question 41Single Answer
निम्नलिखित बोलियों में से कौन - सी बोली उत्तर प्रदेश में नहीं बाली जाती?
  1. A
    मैथिली
  2. B
    अवधी
  3. C
    ब्रज
  4. D
    खड़ी बोली
Question 42Single Answer
भारत की प्रथम देशज भाषा कौन-सी है?
  1. A
    पालि
  2. B
    प्राकृत
  3. C
    संस्कृत
  4. D
    इसमें से कोई नहीं
Question 43Single Answer
भारतेन्दु ने किस पत्रिका का संपादन किया?
  1. A
    हिन्दी प्रदीप
  2. B
    इन्दु
  3. C
    कविवचन सुधा
  4. D
    भारतबन्धु
Question 44Single Answer
पूर्वी हिन्दी विकसित हुई है?
  1. A
    पैशाची अपभ्रंश 
  2. B
    अर्धमागधी अपभ्रंश 
  3. C
    शौरसैनी अपभ्रंश 
  4. D
    मागधी अपभ्रंश
Question 45Single Answer
मानक हिन्दी का आधार क्या है?
  1. A
    खड़ी बोली
  2. B
    अपभ्रंश
  3. C
    पूर्वी हिन्दी
  4. D
    परिनिष्ठ हिन्दी
Question 46Single Answer
हिन्दी के अतिरिक्त कौन-सी भाषा देवनागरी भाषा में लिखी जाती है?
  1. A
    नेपाली
  2. B
    सिंधी
  3. C
    बांग्ला
  4. D
    पंजाबी
Question 47Single Answer
हिन्दी के सर्वप्रथम प्रकाशित समाचार पत्र का नाम है?
  1. A
    सम्मेलन पत्रिका
  2. B
    सरस्वती
  3. C
    उदन्त मार्तण्ड
  4. D
    नागरी प्रचारिणी पत्रिका
Question 48Single Answer
हिन्दी के प्रथम गद्यकार है?
  1. A
    राजा शिवप्रसाद सितारे
  2. B
    लल्लूलाल
  3. C
    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
  4. D
    बालकृष्ण
Question 49Single Answer
चारण काव्य की भाषा है?
  1. A
    डिंगल
  2. B
    प्राकृत 
  3. C
    अवहटट्
  4. D
    ब्रजभाषा
Question 50Single Answer
'संदेश रासक' के रचनाकार हैं?
  1. A
    अमीर खुसरो
  2. B
    अब्दुर्रहमान
  3. C
    बिहारी
  4. D
    रहीम
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