कालीघाट  पाट  कला

19वीं  सदी  में  भारत  के  बहुत  सारे  शहरों  में  नई  लोक  कला  विकसित  हुई । कलकता  के  समीपवर्ती  गाँवों  के  स्थानीय  खर्रा  चित्रकार  ( पटुआ ) और  कुम्हार  मिलकर  एक  कला  शैली  विकसित  कर  रहे  थे । कलकता  कालीघाट  आकर  इन्होंने  पौराणिक  देवी - देवताओं  की  चित्रकारी  आरम्भ  की । इनकी  छवियाँ  गोलाकार  न  होकर  सपाट  होती  हैं ।